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जीवन का सहारा : कुदरत का खजाना समेटने जंगलों में आदिवासी, महुआ बना जीवन का सहारा

Pappu Jayswal

Sun, Apr 12, 2026

चांदनी बिहारपुर. जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र चांदनी बिहारपुर में इन दिनों जंगलों में कुदरत का खजाना बरस रहा है। जहां एक ओर भीषण गर्मी लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती है, वहीं यहां के आदिवासी परिवारों के लिए यही मौसम खुशियों और रोजगार का समय लेकर आता है।मार्च से मई तक का समय यहां के ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। फरवरी के अंतिम सप्ताह से ही महुआ के पेड़ों में फूल और फल आना शुरू हो जाते हैं, जिसके बाद जंगलों में महुआ बीनने का सिलसिला तेज हो जाता है।सुबह तड़के ही महिलाएं, पुरुष और बच्चे टोकनियां व बर्तन लेकर जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। सुबह 5 बजे से लेकर दोपहर तक महुआ बीनने का काम चलता है, वहीं कई जगहों पर शाम को भी ग्रामीण इस कार्य में जुटे रहते हैं।स्थानीय ग्रामों जैसे महूली, नवाटोला और आसपास के वन क्षेत्रों में महुआ के पेड़ों से फूलों की झड़ी लगी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि इन दिनों पेड़ों से महुआ पानी की तरह गिर रहा है, जिसे इकट्ठा करने में पूरा परिवार जुटा रहता है।ग्रामीणों के अनुसार महुआ उनके लिए किसी खजाने से कम नहीं है। करीब 2 से 3 महीनों तक उन्हें इससे रोजगार मिल जाता है। महुआ के फूलों को सुखाकर बाजार में बेचने से अच्छी आमदनी हो जाती है, जिससे सालभर की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है।महुआ के फूल के बाद इसके फल, जिन्हें स्थानीय भाषा में (डोरी एवं “गुली)” कहा जाता है, भी आय का एक बड़ा स्रोत बनते हैं। इन फलों को तोड़कर भी ग्रामीण अतिरिक्त कमाई कर लेते हैं।महुआ बीनने वाले एक ग्रामीण ने बताया कि, “इस समय पेड़ों पर फूलों की भरमार है। सुबह के समय सबसे ज्यादा महुआ गिरता है। हम इसे इकट्ठा कर सुखाते हैं और बाजार में बेचकर अच्छी आय प्राप्त करते हैं।”कुल मिलाकर, चांदनी बिहारपुर क्षेत्र में महुआ का पेड़ आदिवासी जीवन का आधार बना हुआ है। चिलचिलाती धूप के बीच भी लोग पूरे उत्साह के साथ जंगलों में जुटे हैं, क्योंकि यही मेहनत उनके परिवार की आजीविका का मुख्य सहारा है।

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