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:  " ऐ कुछ देना, भैया 10 रुपया दे ना,  कुछ खिला ना " की पुकार...आजादी के 7 दशकों बाद भी ये आवाज..? बात बेबाक.... 

Admin

Mon, Nov 14, 2022

बात बेबाक 

चंद्र शेखर शर्मा पत्रकार

बाल दिवस की हार्दिक मंगल कामनाएँ....

आज बाल दिवस पर कुछ फुर्सत पा टहलने निकल पड़ा चाट ठेले के आसपास चाचा नेहरू के नन्हे मुन्नों की खुशहाली देखने बस स्टैंड , होटल , मंदिर व चाट ठेले की ओर जहां कुछ बच्चे मोमोज , चाउमीन , मंचूरियन , गुपचुप ,चाट- पकोड़े के बीच मस्ती करते दिखे , कुछ मैले कुचैले कपड़ो में चंद पैसों की आस में उनके मां बाप की ओर लालच भरी नजरों से निहारते हाथ फैला " ऐ कुछ देना , भैया 10 रुपया दे ना ,  कुछ खिला ना " की पुकार लगाते। आजादी के 7 दशकों बाद भी ये आवाज  बस स्टैंड , होटल , चाट ठेलों के आसपास सुनाई दे ही जाती है । देश का भविष्य मैले कुचैले कपड़ो में हाथ फैलाये कुछ पाने की आश में पुकार लगाता है । कुछ दयालु रुपये दो रुपये दे देते है तो कुछ झिड़क के भगा देते है । ऐसा दृश्य विकास की अंधी दौड़ में दौड़ाते भागते छोटे मंझोले शहरों से ले कर महानगरों में आसानी से देखने को मिल जाता है । बाल भिक्षावृत्ति और बाल श्रम रोकने को लेकर शासन प्रशासन करोड़ो रूपये खर्च कर विज्ञापन और अफसरों का पेट पालने तनख्वाह के रूप में खर्च कर रहा है जिसका नतीज़ा भले ही सिफर नज़र आता है किन्तु बाल भिक्षावृत्ति करते बच्चे और उनके परिजन जरूर चतुर और चालाक हो गए है जो कैमेरा देखते ही भाग खड़े होते है या मुंह फेर लेते है । बाल भिक्षावृत्ति ना रुकने का एक कारण शराबी मां बाप का निकम्मापन इन्हें परिवार की आर्थिक धुरी बना रखा है तो दूसरा लालफीताशाही की कागजी घोंड़े दौड़ाने की प्रवृत्ति और शिकायत प्राप्त होने का अंतहीन इंतज़ार। सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार की कहानी लिखने बैठो तो कई जन्म लेने पड़ेंगे । 

बात यहां बाल दिवस की शुभकामना को लेकर प्रारंभ हुई थी तो बाल दिवस उन बच्चो का मंगलमय है जिनके बाप दादा जानवरो के चारे से लेकर गरीब गुरबे तक के बच्चो के हक पर डाका डाल अपने बच्चो का भविष्य सुरक्षित कर रहे है बाकि तो चाचा नेहरू और मोदी के देश मे बाल दिवस पर भी कटोरा लिए खड़े है ।

और अंत मे :-

अल्फाज़ के दीवाने तो बहुत हैं तेरे शहर में...

तलाश तो मेरी खामोश बेबसी पढ़ने वाले की है...

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