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हाथ आगे, नीयत पीछे; कसम खाकर बोले— 'भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाएंगे'

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सूरजपुर में ‘सत्यनिष्ठा’ की शपथ : हाथ आगे, नीयत पीछे; कसम खाकर बोले— 'भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाएंगे'

सूरजपुर। कलक्ट्रेट के एयर-कंडीशंड सभाकक्ष में सोमवार को उस वक्त नैतिकता का ऐसा प्रचंड सैलाब आया कि पंखे और ट्यूबलाइटें भी मारे शर्म के थरथराने लगीं। मौका था 'सतर्कता जागरूकता सप्ताह' के शुभारंभ का, जहां जिले भर के आला हुक्मरानों ने एक सुर में, हाथ आगे फैलाकर सत्यनिष्ठा की ऐसी कसम खाई कि अगर कसम सचमुच असरदार होती, तो आधे दफ्तरों की अलमारियां खाली हो जातीं और फाइलों के नीचे दबी ‘गांधी छाप’ पर्चियां चीख पड़तीं।

​मंत्रालय के फरमान पर आयोजित इस वार्षिक कर्मकांड में कलेक्टर रेना जमील की मौजूदगी में अधिकारियों ने गंभीर मुद्रा बनाकर संकल्प लिया— "न रिश्वत लेंगे, न भ्रष्टाचार सहेंगे, देश को समृद्ध बनाएंगे।" शपथ लेते वक्त अफसरों के चेहरों पर इतनी मासूमियत थी कि सामने खड़े परिंदे भी उन्हें सीधा स्वर्ग का टिकट थमा देते। इस बार की थीम रखी गई है— 'सत्यनिष्ठा से समृद्धि', हालांकि जानकारों का कहना है कि शपथ लेने वालों के लिए इसका असली मतलब शायद 'ऊपरी कमाई से अपनी निजी समृद्धि' ही रहा होगा।

​कसम का क्या है, हर साल खाते हैं!

​सभाकक्ष से बाहर निकलते ही एक पुराने 'निशानेबाज' ने खैनी मलते हुए चुटकी ली— "साहब, इस कसम का वजन ठीक उतना ही है जितना चुनावी वादों का होता है। यह तो एक सरकारी फैशन शो है, जहां साल में एक बार खादी और सूट पहनकर ईमानदारी का ढोंग करना अनिवार्य होता है।"

​सच्चाई भी जगजाहिर है। बिना 'सेवा शुल्क' के बाबू की कलम की स्याही सूख जाती है, वहां अफसर भ्रष्टाचार के खिलाफ 'सक्रिय आवाज' उठाने की कसमें खा रहे हैं। कसम खाते वक्त शायद कई दिलों में यह प्रार्थना चल रही होगी— "हे भगवान, यह शपथ केवल दफ्तर के दरवाजों तक ही सीमित रहे, हमारी टेबल की दराज तक न पहुंचे।"

​बड़ा सवाल यह नहीं है कि शपथ किसने ली, सवाल यह है कि शपथ दिलाने वाले और लेने वाले खुद के गिरेबान में झांकने की जहमत कब उठाएंगे? जिले का इतिहास गवाह है कि जो जितनी ऊंची आवाज में ईमानदारी की कसम खाता है, शाम ढलते-ढलते वही फाइलों के नीचे 'सुविधा शुल्क' का सबसे बड़ा सौदागर निकलता है।

​बहरहाल, रस्म अदायगी पूरी हो चुकी है। 1 नवंबर तक सतर्कता का यह पाखंड पूरे जोर-शोर से चलेगा। भाषण होंगे, बैनर चमकेंगे और फोटो अखबारों में छपेंगे। इसके बाद 2 नवंबर की सुबह सूरज निकलेगा, सारे अधिकारी अपनी-अपनी कुर्सी संभालेंगे और दबे मुंह कहेंगे— "कसम तो बस एक हफ्ते की थी, अब काम की बात करो!"

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