: जीवन का अंत करना समस्या का समाधान नही....तनाव सभी के जीवन में होता है...जीवन अनमोल है संघर्ष से ही सफलता मिलती है.....
Admin
Tue, Feb 25, 2020
सूरजपुर- सेंटर फाॅर एडवांस रिसर्च (सीफाॅर) संस्था नई दिल्ली के द्वारा जिला चिकित्सालय सूरजपुर के सभाकक्ष में आत्महत्या निवारण जागरूकता कार्यशाला सम्पन्न हुआ|
तनाव के कारण कोई आत्महत्या ना हो और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को बढ़ाना हमारी कोशिश होना चाहिये कलेक्टर दीपक सोनी ने यह बात आत्महत्या रिपोर्टिंग बी मीडिया संवेदीकरण के दौरान आज कही। उन्होंने कहा तनाव सभी के जीवन में होता है लेकिन हमे लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करना चाहिये कि जीवन अनमोल है और संघर्ष से सफलता मिलती है। यह हम सबका कर्तव्य है और मीडिया की इसमें अहम भूमिका है। आत्महत्या आज कल एक आम बात बन गई है लेकिन जीवन का अंत करना समस्या का समाधान नही होता है। हम सबका कर्तव्य बनता है ऐसी सोच वाले लोगों कि हर प्रकार से सहायता करें ताकि वह जीवित रह सकें।
इस मीडिया कार्यशाला का आयोजन राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर एड्वोकेसी एंड रिसर्च ने मिलकर किया था इसका उद्देश्य पत्रकारों को आत्महत्या कि रिपोर्टिग के बारें में संवेदनशील बनाना था। इस मौके पर डा. राजेश पैकरा, नोडल मानसिक स्वास्थ्य, सूरजपुर ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य पर जन जागरूकता लाने कि जरुरत है। उन्होने बताया विश्व भर में हर साल लगभग 8 लाख आत्महत्यें होती है जिसमें से 21 प्रतिशत भारत में होती है ।

सेंटर फॉर एड्वोकेसी एंड रिसर्च की वरिष्ट परामर्शदात्री सुश्री आरती धर ने आत्महत्या रिपोर्ट लेखन पर चर्चा करते हुए बताया राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एन सी आर बी), 2018 के अनुसार 24.7 प्रति 100,000 व्यक्ति की दर के साथ छत्तीसगढ़ देश में सर्वाधिक आत्महत्या की दरों वाले राज्यों में से एक है। राष्ट्रीय औसत 10.6/100,000 है। राज्य के दुर्ग-भिलाई नगर में आत्महत्या की दर भारतीय शहरों में दूसरे स्थान पर है। यहाँ आत्महत्या की दर 33.1 प्रति 100,000 व्यक्ति है। आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास विभिन्न कारणों से किये जाते हैं जैसे घरेलू समस्यायें, परीक्षाओं में असफलता या नशे की आदत- लेकिन शोधों में यह पाया गया है कि मीडिया में आत्महत्याओं पर आने वाली खबरें बाकी लोगों को उन तरीकों की नकल कर वैसा ही कदम उठाने के लिए प्रेरित करती हैं। इसे कॉपी कैट इफेक्ट’’ कहा जाता है।
एक ही समय में कई अलग-अलग चीजों के अचानक बिगड़ जाने से उत्पन्न हुई स्थिति परिणाम स्वरूप आत्महत्या की घटनाओं को पैदा करती है। इसका कोई एक कारण नहीं होता है और न ही ये प्रवृत्ति किसी एक विशेष प्रकार के व्यक्ति में पायी जाती है। इसके जैविक कारण भी हो सकते हैं जैसे आनुवांशिकी (जेनेटिक्स), पूर्वानुमानित कारण जैसे न्यूरोलॉजिकल विकार या नशे की आदत, या अचानक उद्वेलित कर देने वाले अन्य कोई कारण जैसे निराशा, लोगों के बीच किसी कारणवश शर्मिंदगी या उसका भय होना, संसाधन तक पहुँच होना, कोई बड़ी असफलता या नुकसान होना।
इस विषय की गंभीरता को संज्ञान में लेते हुए विश्व स्वास्थ संगठन ने 2008 में आत्महत्या पर रिपोर्टिंग के लिए मीडिया दिशानिर्देश बनाये द्य ये दिशानिर्देश पत्रकारों को आत्महत्या से जुड़ी खबरों की संवेदनशील रिपोर्टिंग करने की सलाह व मार्गदर्शन देते हैं। दिशानिर्देश इन रिपोर्टों के शीर्षक लिखने में सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं। इसके साथ ही ऐसी रिपोर्टों को सनसनी खेज न बनाने और आत्महत्या के तरीकों को विस्तार से न बताने की वकालत भी करते हैं। एक ऐसे समय में जब अधिक से अधिक लोगों की पहुँच पारंपरिक और सोशल मीडिया तक होती जा रही है, आने वाले समय में स्थितियों के और बिगड़ने की संभावना है।
इन स्थितियों में ये बहुत आवश्यक है कि लोगों को आत्महत्या के विषय पर जागरूक किया जाये। पैरोकारी की इस प्रक्रिया में मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

निम्न बिन्दुओं हैं.....
१) मीडिया को ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए जो आत्महत्या को सनसनीखेज या फिर एक सामान्य सी बात बनाती हो या इसे समस्याओं के हल के तौर पर दिखाती हो द्य अक्सर देखा गया है कि लोगों का ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से शीर्षक सनसनीखेज बनाये जाते हैं द्य अधिकाँश रिपोर्टों के लिये ये न्यायोचित हो भी सकता है लेकिन आत्महत्या पर रिपोर्ट लिखते समय ऐसा बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि ये पाठक पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं द्य इसलिये इस बात पर ध्यान देना भी जरूरी है कि शीर्षक सनसनीखेज न बनाये जायें द्य शीर्षक में आत्महत्या शब्द को इस्तेमाल करने से बचा भी जा सकता है।
२) आत्महत्या की रिपोर्टों को पृष्ठ में मुख्य स्थान पर लगाने व उनके गैर जरूरी दोहराव से बचना जनहित के लिए एक अच्छा प्रयास हो सकता है द्य इसके साथ ही आत्महत्या या आत्महत्या की कोशिश में अपनाये गए तरीकों को विस्तार से बताने से बचें ।
३) जहाँ तक सम्भव हो रिपोर्ट में मृत व्यक्ति की फोटो का इस्तेमाल करने से बचें ।
४) रिपोर्ट को इस तरीके से लिखा जा सकता है कि उसमें इस्तेमाल किये गये तरीके के बारे में न बताया जाये और इसका खबर पर कोई प्रभाव भी न पड़े ।
५) आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के परिवार जनों के प्रति संवेदनशीलता दिखायें और ये जानकारी दें कि आत्महत्या की प्रवृत्ति देखने पर कहाँ से मदद लें द्य आत्महत्या की रोकथाम के लिए किये जा रहे प्रयासों में एक जरूरी पक्ष ये समझना भी है कि मीडियाकर्मी स्वयं भी आत्महत्या की ऐसी रिपोर्टों से प्रभावित हो सकते हैं ।
मानसिक बीमारी एवं आत्महत्या के मामलों की रिपोर्टिंग पर पीसीआई द्वारा अपनाए गए दिशा-निर्देश।
पिछले वर्ष प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया ने भी विश्व स्वास्थ संगठन की तर्ज पर ही आत्महत्या रिपोर्टिंग के लिए दिशानिर्देशजारी किये है और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 24 (1) के उद्देश्य से मानसिक बीमारी से संबंधित समाचारों के प्रकाशन एवं रिपोर्टिंग से संबंधित परिषद ने मानदंड अपनाया है, जिसके अनुसार मीडिया मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठान में उपचार के दौरान किसी व्यक्ति के संबंध में तस्वीरों या किसी अन्य जानकारी को प्रकाशित नहीं करे।कार्यशाला में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हरीश राठौर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ आर एस सिंह सिविल सर्जन डॉ शशी तिर्की डीपीएम अनीता पैकरा राज्य विधिक सलाहकार सुश्री ख्याति जैन मौजूद रही।
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