: बात बेबाक...नारायण नारायण...धूमिल होती पत्रकारिता...
Wed, Nov 16, 2022
चंद्र शेखर शर्मा पत्रकार
बात बेबाक
30 मई 1826 को पंडित युगुल किशोर शुक्ल जी ने प्रथम हिन्दी समाचार पत्र
'उदन्त मार्तण्ड
' का प्रकाशन व संपादन आरम्भ कर पत्रकारिता को जन्म दिया जिसकी याद में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है. कालांतर में 16 नवम्बर 1966 को भारतीय प्रेस परिषद का गठन किया गया और प्रत्येक वर्ष 16 नवम्बर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाने लगा परंतु पत्रकारिता के लगभग 19 दशक से अधिक के सफ़र में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद वेब पोर्टलो की बाढ़ के चलते पत्रकारिता के नाम पर जो हो रहा है वह सोचनीय व चिंतनीय है. पत्रकारिता जो कभी एक मिशन हुआ करती थी कारपोरेट घरानो के प्रवेश के साथ व्यवसाय बन गयी. व्यवसाय बन चुकी पत्रकारिता में
शर्म है कि आती नही और बेशर्मी जाती नही
. वैसे आजकल पत्रकार बनने के लिए पत्रकारिता की डिग्री होना, अनुभव होना या इसकी
A B C D
का ज्ञान जरूरी नहीं बस चमचगिरी का गुण और अंटी में नोट हो, भले ही आप अंगूठाछाप हो. पत्रकारिता के गिरते स्तर के चलते विज्ञापन ख़बरों की तरह और ख़बरें विज्ञापनों की तरह परोसी जा रही है. समाज मे कहने को तो पत्रकारिता को चौथा स्तम्भ कहा जाता है परंतु व्यवसायीकरण के चलते समाज के इस चौथे पाये को भी घुन लगने लगा है जिसे चमचागिरी, लालच का दीमक धीरे धीरे खोखला भी करता जा रहा है. व्यवसायिकता के दौर में आज भी पत्रकारिता उंगलियो में गिने जा सकने लायक कर्मठ लोगो की वजह से ज़िंदा है वरना हालात
कोठे की बदनाम गली
से बदतर हो चले है. पत्रकारिता के चल रहे दौर को देख आदि पत्रकार नारद जी और भगवान विष्णु जी की एक पौराणिक कथा प्रासंगिक लगती है. नारद जी पत्रकार थे तो भगवान विष्णु जी उनके स्वामी हुए. जिनका प्रचार वो हर समय नारायण-नारायण कह कर करते थे. उन्हीं भगवान विष्णु ने एक प्रसंगवश नारद जी को एक दिन बंदर बना दिया था, अंत में बंदर बनने की प्रकिया में लगे तमाम नारद रूपी साथियों को भी
राष्ट्रीय प्रेस दिवस की अशेष बधाईयाँ ........
और अंत में:-
ज़रा सी बात पर शोर करूँ ,ये मेरी आदत नहीं..गहरी जड़ का बरगद हूँ , दीवारों पे ऊगा मैं पीपल नही ।।
: "दीदी ओ दीदी"
Mon, Nov 14, 2022
बात बेबाक
चन्द्र शेखर शर्मा पत्रकार
पंडरिया विधानसभा की राजनैतिक आबो हवा की मिठास कहे या यहाँ के स्थानीय राजनेताओं की कमजोरी या दुर्भाग्य कि जिले की राजनीतिक जमीन बाहरी नेताओ के लिए काफी उर्वरा रही है । पंडरिया की राजनीति में एक कहावत "गांव के जोगी जोगड़ा आन गांव के सिद्ध" चरितार्थ रही है । स्थानीय नेताओं के होते हुए भी यहाँ भाजपा बाहरी प्रत्याक्षी थोपती रही है तो कांग्रेस भी पैराशूट के जरिये बेमेतरा से आयातित ममता के सहारे पंडरिया सीट पर कब्जा करने में कामयाब हुई है। बेमेतरा जिले में राजनीति की क ख ग सीखने वाली ममता पंडरिया के सहारे भले ही विधानसभा पहुंचने में सफल हुई है किंतु पत्नी के राजनीतिक क्षेत्र में पति की दखलंदाजी से क्षेत्र में समय समय पर किरकिरी होती रही है तो दूसरी ओर गुजरात दौरे पर पीएसओ की जगह पति को सुरक्षा गार्ड की तरह ले जाना भी क्षेत्रवासी पचा नही पा रहे इधर विपक्ष अब विधायक दीदी के पति प्रेम , रिस्तेदारो और करीबियों को कथित स्वेच्छानुदान के बहाने घेर कर मुद्दा बना भुनाने की फिराक में है । भाजपा के कथित समर्थकों को सोसायटी के अध्यक्ष बनाये जाने से नाराज कांग्रेसी इस्तीफे देने बेसब्र है इस बात की पुष्टि विधायक दीदी के करीबी व जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव जलेश्वर सिंह की सोसायटी अध्यक्ष बनाने के नाम पर पैसों की मांग के वायरल आडियो से होती दिखती तो है भले ही आडियो वायरल होने के बाद जलेश्वर को कांग्रेस से निष्कासित किया जा चुका हो किन्तु सीएम के भेंट मुलाकात कार्यक्रम में मिलने वालों की सूची में जलेश्वर नाम होना कर्मठ कार्यकर्ताओ के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहा है , दीदी की ममता से महरूम कार्यकर्ताओं का रोष सड़क पर आ चुका है , कार्यकर्ता भी अब अपनी नाराजगी जाहिर करने अकबर के दरबार मे हाजरी लगाने लगे है । बहरहाल विधायक दीदी की ममता से महरुम कर्मठ कार्यकर्ता हैरान परेशान है कि आखिर कब तक दरी उठईया नेता बने फिरेंगे दीदी से नाराज कार्यकर्ता अपना नया रहनुमा तालाश रहे । सीएम के साथ भोजन में कार्यकर्ताओं की जगह विधायक पति का भोजन करना और विधायक पति का जिला से बाहर स्थानांतरण होना पूरे प्रदेश में चर्चित हो चला है । बेमेतरा से आयातित दीदी के लिए पंडरिया की जमीन उर्वरा साबित जरूर हुई किन्तु चापलूसों की चौकड़ी के प्रति दीदी की बरसती ममता , पंडरिया के निगरानी सुदा सटोरिया से करीबी कांग्रेस के जनाधार पर आघात कर कार्यकर्ताओ के मनःस्थिति को डाँवाडोल कर रहा है ।
राजनीति से कोसो दूर का वास्ता न रखने वाली गोबरहीन टुरी मेरी बकवास सुन कहती है तहू भकला हस का महाराज अतका नई जानेस जी आजकल पैसा फेंक तमाशा देख राजनीति होगे हे , जनता और कार्यकार्या के भावना के कोई मोल नही हे तभे तो जिला के राजनीति बेमेतरा ले आ के घलो चल जाथे अउ लोगन ओखर नाम ले उगाही करत है तो वहू बपुरी का करय घर देखय , क्षेत्र देखय की वसुलीबाज चापलूस मन ले निपटे । सिधवा पा के बेचारी राजनीति के शिकार होवत ही जी ।
और अंत मे :-
जरूरी नही है कि चोरों का हो एक ही घराना,
दर्द और राजनीति का रिश्ता है पुराना ।
: " ऐ कुछ देना, भैया 10 रुपया दे ना, कुछ खिला ना " की पुकार...आजादी के 7 दशकों बाद भी ये आवाज..? बात बेबाक....
Mon, Nov 14, 2022
बात बेबाक
चंद्र शेखर शर्मा पत्रकार
बाल दिवस की हार्दिक मंगल कामनाएँ....
आज बाल दिवस पर कुछ फुर्सत पा टहलने निकल पड़ा चाट ठेले के आसपास चाचा नेहरू के नन्हे मुन्नों की खुशहाली देखने बस स्टैंड , होटल , मंदिर व चाट ठेले की ओर जहां कुछ बच्चे मोमोज , चाउमीन , मंचूरियन , गुपचुप ,चाट- पकोड़े के बीच मस्ती करते दिखे , कुछ मैले कुचैले कपड़ो में चंद पैसों की आस में उनके मां बाप की ओर लालच भरी नजरों से निहारते हाथ फैला
" ऐ कुछ देना , भैया 10 रुपया दे ना , कुछ खिला ना "
की पुकार लगाते। आजादी के 7 दशकों बाद भी ये आवाज बस स्टैंड , होटल , चाट ठेलों के आसपास सुनाई दे ही जाती है । देश का भविष्य मैले कुचैले कपड़ो में हाथ फैलाये कुछ पाने की आश में पुकार लगाता है । कुछ दयालु रुपये दो रुपये दे देते है तो कुछ झिड़क के भगा देते है । ऐसा दृश्य विकास की अंधी दौड़ में दौड़ाते भागते छोटे मंझोले शहरों से ले कर महानगरों में आसानी से देखने को मिल जाता है । बाल भिक्षावृत्ति और बाल श्रम रोकने को लेकर शासन प्रशासन करोड़ो रूपये खर्च कर विज्ञापन और अफसरों का पेट पालने तनख्वाह के रूप में खर्च कर रहा है जिसका नतीज़ा भले ही सिफर नज़र आता है किन्तु बाल भिक्षावृत्ति करते बच्चे और उनके परिजन जरूर चतुर और चालाक हो गए है जो कैमेरा देखते ही भाग खड़े होते है या मुंह फेर लेते है । बाल भिक्षावृत्ति ना रुकने का एक कारण शराबी मां बाप का निकम्मापन इन्हें परिवार की आर्थिक धुरी बना रखा है तो दूसरा लालफीताशाही की कागजी घोंड़े दौड़ाने की प्रवृत्ति और शिकायत प्राप्त होने का अंतहीन इंतज़ार। सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार की कहानी लिखने बैठो तो कई जन्म लेने पड़ेंगे ।
बात यहां बाल दिवस की शुभकामना को लेकर प्रारंभ हुई थी तो बाल दिवस उन बच्चो का मंगलमय है जिनके बाप दादा जानवरो के चारे से लेकर गरीब गुरबे तक के बच्चो के हक पर डाका डाल अपने बच्चो का भविष्य सुरक्षित कर रहे है बाकि तो चाचा नेहरू और मोदी के देश मे बाल दिवस पर भी कटोरा लिए खड़े है ।
और अंत मे :-
अल्फाज़ के दीवाने तो बहुत हैं तेरे शहर में
...
तलाश तो मेरी खामोश बेबसी पढ़ने वाले की है
...